वो पीर दिखाई दे मुझको

जो पीर दबी तेरे अंतस में वो पीर दिखाई दे मुझको।
सौ जतन ढाँप लो किन्तु हर चीर दिखाई दे मुझको।

अधरों पे रख मुस्कान सहज सैकड़ो बात बनाते हो ।
कर नखट चुहल नादान भाव कुछ इतर जताते हो।।
ठहरी अँखियों उथला आये रह रह जो क्षीर सा नीर ।
दिखाई दे वो मुझको .....

भीड़ उलझ के दिन काटो निशि चन्द्र कहो मन घात ।
ज्वार दबाओ कोटिश भीतर रखकर हृद पर हाथ ।।
करवट करवट जाए उलझ जो स्वांस पवन गम्भीर ।।
सुनाई दे वह मुझको.......

जीवन चादर पसरी सिलवट विषम कहानी कहती हैं।
कोई नमी तेरे सिरहाने सबसे छुप छुप कर पलती है ।।
तप्त गात उच्छवास शीत और भीगे जाते क्यो हाथ ।।
दिखाई दे वो मुझको......
प्रियंवदा अवस्थी©2013

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