यूँ तो हुजूम सा है

यूँ तो एक हुजूम सा है दिल के आशियाने में
ये भीतर फिर कोई यूँ बेक़दर तन्हा क्यों है ।।

निगाह मेंभी  है वो और हद ए निगाह में भी है।
फिर ये रास्ता दरमियाँ वो इतना लंबा क्यों है।।

महक उठते हैं हम जिसकी आहट भर से ।
वो ही एक गुल गुलशन से गुमशुदा क्यों है ।।

बिछे बैठे हैं ज़माने से जिनके कदमो तले ।
वो बात बात दिल ए जज़्बात रौंदता क्यों है ।।

लबों पे उफ़ नही कोई न ही निगाहों में शिकन। 

दिल में बैठा हैतो आंखों से उफनता क्यों है ।।

प्रियंवदा अवस्थी©2015

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां