बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर

अभिलाषाएं अगणित अनंत हृद प्रिय तुम संग
जिनका कोई ओर न छोर
बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर

धरो रूप कितने ही कैसी भी छटा बदल लो तुम
धूप छाँह शीत बरखा जो कुछ भी ला रख दो तुम
विचलित ना होऊँ किंचित
ना बैठूँ मैं तुमसे मुख मोड़
बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर

मन के धन दिखते सबरे यहाँ सूरज चाँद सितारे
क्या अस्तित्व भला इनका बिन तेरी बाँह पसारे
सांझ सुहागन होती तुमसे
माथ पे बिंदिया टांके भोर
बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर

इत बैठी मैं तुम उत ठहरे दोनों पे हैं जग के पहरे
पृथक पंथ के हैं राही मौन प्रीति नित परसें गहरे
वचन अखण्ड रहे समअर्पण
जदपि हो मिलन नैन के ठौर
बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर
प्रियंवदा अवस्थी©2015

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