उसमे भी है जान

नश्तर खुलते ही पुराने
हो जाता है सब कुछ बेसाज़
लिपट जाती है जब कानो
फिर फिर एक वही आवाज़
रिश्ता ही कुछ ऐसा जिसे
पुकारा सृष्टि का आधार
होता रहा जो सदियों से
समय बेसमय तार तार
निकल पड़ता ज़िंदगी के
सफर ले विरोधाभास महान
सम्बन्ध जोड़ने को रख
दोधारी तलवार रेशमी म्यान
करता निज पर अभिमान
चढ़कर देह की धरा सोपान
मसल कुचल देता चाँदनी
चीर कर रूह का आसमान
ढेर कर फ़लक के सितारे
लालसा लपकने की चाँद....
लिपटती रेशमी हर छुवन
अन्तरतम से वह छुड़ाती
खुद से खुदी को नोचती
स्वांस स्वांस तिलमिलाती...
दिन महीने मौसम औ वार
बामुश्किल जोड़ पाती है 
तन मन टूटे घर की दीवार....
देखती बुझती आंखों से
घुट घुट नग्न नर्तन संसार
फिर फिर न टूटे बिखरे
वजूद से अब बेतारी के तार
कि नही फट सकेगी धरा
सीता नही कोई वो सतयुग की
नही उतरेगा लेकर हाथों लाज
कोई लीलाधर कृष्ण आज
कि द्रौपदी नही वो द्वापर की
नही होगा सात्विक स्पर्श
कि अहिल्या नही वो प्रस्तर की
युगों की विडम्बनाओं से परे
समय की धार से सर्वथा विलग
बहने दो न उसे यूँ ही
नामित होकर गुमनाम
जीने दो उस एक जिस्म को
कि उसमे जब तक है जान  ......
प्रियंवदा अवस्थी

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