मेरे और तुम्हारे दरम्यान
मेरे और तुम्हारे दरम्यान
अक्सर ही
सैकड़ों बातें
लहरों सी आकर ठहरी हैं
इन नर्म किनारों पर....
और फिर बस,,
क्या तुम और क्या मैं ?
सुनहले सूरज की तरह
औंधते हुए से सारे गम
एक दूजे की धरपकड़ को
भागते हुए से ये नयन,,,,
मेरे और तुम्हारे दरम्यान,,,,,
अक्सर ही,,,,
प्रीत कब हुई कहो न
स्वरों की मोहताज़
तो रहने दो न इन्हें
आज आज़ाद
शब्दों की हर बन्दिशों से
देखा है मैंने, निरन्तर...
तुम्हारा निःस्वार्थ समर्पण...
सुने हैं सागर में लहर लहर
में झंकृत ये छनछन ....
हवाओं गूंजती सी ये सनसन,,
तुम्हारे हर अव्यक्त को
सम्पूर्णता से व्यक्त करते
पंछियों की ये चुलबुली हलचल ,,,
क्या कुछ नही कह जाते ये
जो थम से जाते है अक्सर आकर
कम्पित इन नर्म किनारों पर
एक दूसरे को निहारते ही
मेरे और तुम्हारे दरमियान,,,,,,
अक्सर ही... (2013)
प्रियंवदा
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