उजड़ी नींदों का सफर
उजड़ी नींदों का सफर भी फ़िर सुहाना हो गया।
गुज़रा यूँ छूकर वो पलके कि दीवाना हो गया।।
करवटों पर लिख रहा था जब दर्द कुछ इबारतें ।
सिलवट ए मन खोलते वो तो परवाना हो गया ।।
ख्वाब हो हैरान अँगड़ा आँखे मसल तकने लगे ।
एक ज़रा इनकार सौ बातों का बहाना हो गया ।।
इश्क के अंधड़ छिपे कब साँस हो या फिर हवा
नज़रें मिली औ इश्क छलकता पैमाना हो गया ।।
मुफ़्त की बदनामियाँ ले नाचता फिर भी ये दिल
आग दरिया सुनते जब कि एक ज़माना हो गया ।।
प्रियंवदा अवस्थी©2016
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