ये कौन हुआ है आज किसी का

ये कौन ?
हुआ है आज किसी का कि
कि अनछुए ही
निष्प्राण हुई मुस्कराहट
हो उठी मुखरित
लगकर हृद की चौखट
शुष्क रुष्ट तप्त आक्रांत 
स्वेदित नम हथेलियों पर
ठहरी हैं कब
चपल इच्छाओ की रेखाएं
न ही उस पीपल की छाँव
न ही हरियाली नीम के गाँव
रोके कब रुकी उनींदी आंखों
जागे अधजागे स्वप्नों की
बेखटका आवाजाही
खुली अधखुली पलकों से
करते जीवन को उगाही
रहने दो इन्हें आज यूँ ही
नम मुखरित चपल सबल
कितना सुखद बेवक्त बेमौसम
बिन बुलाए
इनका बस यूं ही आ जाना
सवालों उलझाना
जवाबो आस पास बिखर जाना
कितनी ठहरी रही ज़िंदगी
समय की धार बहकर
कुछ तुम समेटो
कुछ मैं सहेजती हूँ
साँझ फिर साझा कर लेंगे
आपस में दो कदम चलकर
खूबसूरत ख्यालों के
महकते हुए इन जवाबों को....
प्रियंवदा

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