लौट आना बेफ़िकर
लौट आना बेफ़िकर जब भी तुम्हारा दिल करे
तोड़ देना नींद जो तन्हा ख्वाब लग जाये गले ।।
मैं हर पल राह देखती हूँ ।
जब भी आवाज़ सुनती हूँ ।।
वो एक दर्पण कभी जिसको संग साथ था निहारा
किसी एक स्याह लम्हे ने जिसे बेतरह तोड़ डाला ।।
मैं वो हर कतरे बटोरती हूँ ।
आँच रख कांच जोड़ती हूँ ।।
बैठ कोकिल कंठ शाखों ढाई आखर बोलती थी।
शहद कानो में जीवन का जो हरपल घोलती थी।
मैं वो झनकार खोजती हूँ ।
जब कोई परिंदा देखती हूँ ।।
खुशबू आती है भूले भटके कभी इस आँगन में।
तन को लहराते नहा जाती है मन के तालों में ।।
वो एक शबाब खोजती हूँ
जब कोई गुलाब देखती हूँ ।।
बात कोई भी बड़ी छोटी समय की बात है होती ।
सुलगते रिश्तों के चूल्हों पर ज़माना सेंकता रोटी ।।
ये लिख तुम्हे रोज भेजती हूँ
हवा को रुख पलटे देखती हूँ ।।
प्रियंवदा ©2013
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