मंदिर मंदिर क्यों भटकूँ

मंदिर मंदिर क्यो भटकूँ मैं
जब तुम हृदय विराजे
रग रग तन्मय प्रेम तुम्हारे
भाल तुम्ही हो साजे
नयन ज्योति आरती उतारूँ
मैं तुमपर सब हारी
तुम संग लगन लगी है जबसे
सुध बुध बिसरी सारी
आलिंगन जयमाल बना और
स्वासों धूप जलाऊँ
सुर मंजीरे हृदय थाप पर
मन मिरदंग बजाऊं
तन शाकल्य करूँ हवि-जीवन
परम चरम पा जाऊँ
मंदिर मंदिर क्यों भटकूँ मैं
प्रियंवदा अवस्थी©2013

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