दरक रहा भीतर यह कौन
ना जाने क्यों गुमसुम से तुम....
मुझमें भी चुप यह आज कौन ...
किस गति को थाम रहा अन्तस्
स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन...
फिर झरे निझर मन के मोती
फिर कुछ एक स्मृतियां रीती ...
कुछ कुछ बिखरे छिटके वादे...
कुछ गहराए उथले रिश्ते नाते....
करते आवंटन सब आपस में
गीले सीले से अधि पावस में
क्या खोया खोज लगी चाहत
पाया क्या तोल रहा अध पौन.....
निसि वासर चक का एक व्यूह
जीवन विधि विडम्ब का समूह
कूटे छीटे बीने कितना जीवन
अर्पण प्रतिअर्पण और तर्पण
दिखता बाहर समतल सपाट
फिर दरक रहा यह भीतर कौन....
ना जाने क्यों कुछ विह्वल तुम
प्रतिपल गहराता मुझमे कौन ....
किस गति को थाम रहा अन्तस्
स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन .....
प्रियंवदा©2017
Comments
Post a Comment