सीप के घर ठिकाना चाहती हूँ

आज कुछ गुनगुना रहा है दिल
आज कोई गीत गाना चाहती हूँ।
धड़कने सुर सजा रही कुछ ऐसे
साज़ ए दिल मैं बजाना चाहती हूँ।।

महकते गेसुओं एक गुथ बनाकर
खुशबू तुमपर उढ़ाना चाहती हूँ ।
तुम चमक जाओ चाँद की तरह
ऐसी महफ़िल सजाना चाहती हूँ।।

तार टूटे न कोई न साज़ ही रूठे
नगमा ऐसा सुनाना चाहती हूँ।
बात कोई उठे न दर्द की शब भर
सुबह सी खिलखिलाना चाहती हूँ ।।

आब आंखों रहा और रूह प्यासी
एक समंदर समाना चाहती हूँ ।।
अब्र सी धूल पिघल जाऊँ तपके 
सीप के घर ठिकाना चाहती हूँ ।।
प्रियंवदा

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