मेरा कहीं फिर निशाँ ना रहे

तुझ पे खर्च दूँ मैं ये जिंदगी कि मेरा कहीं फिर निशाँ ना रहे
मुझे तुझको पाकर खोने की दहशत कोई फिर जवाँ ना रहे।।

इशक घोल दूँ तेरे मन के समंदर कि बन जाऊँ नमक मैं
तेरी बेसुआदी शिकायत कभी फिर इस जुबान ना रहे ।।

मुकम्मल करूँ मेरी चाहत मैं ख़ुद को तुझी में मिलाकर
जो तू सांस ले उसकी खुशबू मेरा पता ओ ठिकाना रहे ।।

बाँटी चाहतें इस ज़माने ने फ़क़त दो जिस्मों की सूरत ।
उन्हें ज़रा खबर हो कि रूहों कभी भी फासला ना रहे ।।

है दीवानगी दिल की न देखो इसे नज़्र ए शक़ से कोई ।
मुझे रश्क़ इसपे कोई दूसरा अब इसको कुछ भी कहे ।।

प्रियंवदा अवस्थी©2013

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