मुश्किल दरवाजों से गुजर
ज्ञान का एक असीम भंडार
मस्तिष्क
बस एक सोच ही होगी कुछ
क्लिष्ट
पग पग हृदय पथ दिखाता रहा
हाथ पकड़
एक यही जड़ न कर पाई कहीं
अपना घर
क्यों न अब कुछ एक दिन ऐसा
कर लें
इन पञ्च पटों की आभास ऐन्द्री
बन्द कर लें
काया को देते हुए तनिक विश्राम
माया को कह दें ले अल्प विराम
अचेतनता चेतना स्वतः ही भर लेगी
घुमड़ घुमड़ चतुर्दिक मधुबन कर देगी
बिना कोई अनुशासन आजमाए
नीति समझाए, नियम सिखाए
सुना तो होगा तुमने भी शायद
घुप्प अंधियारे में एक सितारा भी
पथ दिखला जाता है
मुश्किल दरवाजों से गुज़रकर ही
कोई तकदीर बुलन्द कर पाता है
प्रियंवदा अवस्थी©2014
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