परदेस गमन के बाद पहला पत्र
इस शरद पूनम बहुत याद आये तुम.....
सुनो प्रिय....
परदेश गमन के पश्चात
ये मेरा पहला पत्र तुमको
जानते हो तुम
बरसों बरस गए
क़लम नही पकड़ी इन हाथों
शब्द आड़े टेढ़े हो जाएं
क्षमा करना
अर्थ कदापि टेढ़े न होंगे
विश्वास है मेरे विश्वास पर
तुम्हारा लम्बा चौड़ा आँगन
आज भी उतना ही विशाल है
कितने भी मौसम आये गए
एक भी दीवार नही खड़ी होने दी मैंने
हर साँझ इसे नाप जो लेती हूँ
जेठ ने कितनी भी नमी सोखी
सावन फिर कितना भी बरसा
ड्योढ़ी आज भी उतनी ही
समतल और सपाट है
जैसी छोड़ गए थे तुम
हर रोज लीप बुहार कर लेती हूँ
सुनो...
भूलने की आदत भी अब जाती रही...
हर चीज की अब कोई
नाप तोल नही करनी पड़ती
देखना इस बार जब तुम इधर आओगे
आँच तपी रोटियाँ भाप से ठसाठस
सोंधी और आकार में नज़र आएंगी तुम्हे
पुराने चावल में कितना पानी
कितना नमक कितनी मिठास
सब कुछ जान समझ गयी हूँ मैं
इस शरद पूनम..
बहुत याद आये तुम ....
बदलते ऋतु की चौखट पर
पतझर फुसफुसाता है
और क्या लिखूँ ?
सुनो अब वसंत तक तो आ ही जाना
हाथों में गुलाल लेकर...
प्रियंवदा अवस्थी2013
Comments
Post a Comment