कैसे ये गुनाह हो गया
कैसे कहूँ कि कैसे यह गुनाह हो गया
अपनी ही रंजिशों दिल तबाह हो गया ।।
कोई नही था वो मेरा पर कोई लगा मुझे
इस बदगुमानी से मेरा निक़ाह हो गया ।।
खिड़की से झाँकता जो आसमाँ का चाँद
क्यो उससे प्यार मुझको बेपनाह हो गया ।।
मैं हाथ बढ़ाती तो हूँ उस तक नही जाता
दुनिया के डर से दर मेरा सियाह हो गया ।।
प्रियंवदा अवस्थी©2012
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