न जाने क्यों
ना जाने क्यों गुमसुम से तुम....
मुझमें भी चुप यह आज कौन ...
किस गति को थाम रहा अन्तस्
स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन...
फिर झरे आज मन के मोती
फिर कुछ एक स्मृतियां रीती ...
कुछ कुछ बिखरे छिटके वादे...
कुछ गहरे उथले रिश्ते नाते....
करते आवंटन सब आपस में
गीले सीले से अध पावस में
ना जाने क्यों कुछ विह्वल तुम
प्रतिपल उथलाता मुझमे कौन
किस खोज अतृप्त हुई चाहत
क्या तौल रहा तनमन अध पौन.....
दो गात लवण और हाथ स्वेद
दोनों माटी संग सने बने
दिखता बाहर सबकुछ सपाट
यह दरक रहा फिर भीतर कौन....
समेटती रही पनीली मोतियाँ
सपनीली गर्दीली हथेलियाँ ....
कुछ कहने सुनने के मध्य पसरा
अगढ़ रेशम समेट बंट
पिरोती रही रात मुक्ताहार ....
आंखों आंखों में कहते
बस यूं ही चुप रहते ...बहते
कभी कुछ बिखर जाना
होता है कितना बेहतर
बहुत कुछ सहेज लेने को
फिर से एक बार ....
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