जब से तुम मिले हो
जब से तुम मिले हो
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जबसे तुम मिले हो
उच्चारण सरल हो गए
शब्दार्थ भावार्थ
सब समझ आने लगे
सन्दर्भ ही ऐसे सजाए तुमने
कि प्रासंगिक हो गईं
मेरी हर एक पंक्तियाँ .....
वरना तो हम सिर्फ
जोड़तोड़ ही करते रहे
पिरोते रहे धरती और आसमान
तो कभी ज़िंदगी के समान
लिखते रहे बस यूं ही
कभी चाँद ...
कभी तारों को समेटकर
मथ कर इह जीवन
मन रस को निचोड़कर
किन्तु जबसे तुम मिले हो
जीवन एक कविता हो गई
जिसके उच्चारण सरल हो गए
समझ आने लगी विधा
और व्याकरण जीवन के .....
प्रियंवदा अवस्थी©2014
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