कुछ और ही हो जाती हूँ

जब जब तुम
मौन हो जाते हो
यूं ही बातों ही बातों में
जाने क्या कह जाती हैं
आंखें तुम्हारी....
कि बिखर बिखर पड़ती हैं
मोतियाँ पूरे घर आँगन
छनक उठती है पायल
सन्नाटों को चीरकर
कड़क उठती है बिजली
बरस बरस पड़ते हैं
नेह के मेघ
पसर जाती है सुगन्धि
चौखट से चौबारे तक
बोलो न तुम!
क्या कह जाते हो
आंखों ही आंखों में
जिसे देख मैं "मैं" रहती
कुछ और ही हो जाती हूँ
यूं ही,
बातों ही बातों में....
प्रियंवदा अवस्थी©2013

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