पियु लाये चुनरिया लाल

पियु लाये चुनरिया लाल ओढ़ मैं उन्हें रिझाऊं
नख शिख करके श्रृंगार आज खुद पे इतराऊँ

आँगन करें बात बहलाव
लिए नैन मुख कौतुक भाव
चमक उठे हर आहट पाके
कब झलक मोरी दिखलाऊँ,,,,

कंगन हार करधनी मैं बाँधूँ
मुँदरी बिछुवे औ पायल साजूँ
पहन चूड़ियाँ भर भर हाथों
आज बिना बात खनकाऊं....

लाली बिंदिया झुमका कजरा
केशों पुलक सजाऊँ गजरा
रुच रुच चुटकी मांग भरूँ औ
दर्पण से लपट झपट मुस्काऊँ...

सुर्ख महावर पग रच रच के
अंग सुगन्ध प्रीत रच बस के
नयन काढ़ लाज घूंघट पट
चरम पद प्रीत पदम् रख आऊँ.....
प्रियंवदा अवस्थी ©2014

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