एक टूटे हुए सपने का दर्द

एक टूटे हुए सपने का दर्द
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भोर की किरण के साथ ही
उसका बेपरवाह पलको से
यकायक फिसल क्या जाना,,,
जैसे किसी मासूम बच्चे की
भीड़ के रेले झमेले में यकायक
अपनो की ऊँगली छूट जाना,,,,

भय मिश्रित सिहरन को ढोकर
बिस्तर की हर सिलवटों से होकर
बदहवास तन मन के हर छोर पर
छोड़ता बेचैनी और छटपटाहट
असफल कोशिशें, और हड़बड़ाहट ,,,

उनींदी आँखों की नम कोरों पर
पलकों की उलझी कुछ डोरों पर
करता रहा वो सबकुछ उलट पलट
गहरे समा जाने की करते जद्दोजहद

मायूस था इस कदर कि भूलवश
कोई गहरा रिश्ता तोड़ आया हो
समय की कठिन राह पर उसके
सम्मुख चौतरफा मोड़ आया हो

पूर्णता से पूर्व टूटे हुए ,स्वप्न का दर्द
भीषण था, स्वेद हाथ मलता रहा
कैद कर फिर उजालों में स्याह चाँद
पलकों ऊपर निरीह , साँझ तक मौन बैठा रहा,,,,,

प्रियंवदा अवस्थी

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