अपना भी एक मकान होता

धूप में ही सही अपना भी एक मकाँ होता
साथ ज़िन्दगी का कुछ एक सामान होता
दर ब दर न होते यूँ खुशनुमा एक जहां होता
मगर जो सोचते हैं वो कब और कहाँ है होता ।।

मैं इन आहों सही तेरे हर एक गम सुखा देती
तेरे पहलू में ज़माने भर की खुशिया सजा देती
ज़मीन औ आसमा के बीच न कोई फासला होता
मगर जो सोचते हैं हम वो कब और कहाँ है होता ।।

ज़िल्लत में खोजती फिरी है जन्नत ये ज़िन्दगी
करते रहे हम तेरे शहर की हवाओं की बन्दगी
एक झोंका ही सही तेरे होने का कुछ पता देता
मगर जो सोचते हैं हम वो कब और कहाँ है होता ।।

बहारों के दिन इधर आते भी हैं चले जाते हैं
भूले भटके कभी पास चौखट से गुज़र जाते हैं
ठहर जातें बनके मेहमाँ जो कोई छत बना देता
मगर जो सोचते हैं हम वो कब और कहाँ है होता।।
प्रियंवदा

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