दिन दुःशासन


एक दिन रोज ही उग जाता है
मन के आकाश का चीरहरण कर
पुनश्च किसी नई महाभारत को
शंखनाद सा करते हुए
आ खड़ा होता है सम्मुख
द्वंद्व प्रतिद्वंद्व में लिप्त विचारों का
अथाह सैन्य समूह सा लेकर
आँख के खुलते ही मुझे
दिखने लगते हैं चौतरफा
शकुनियों के फेंके हुए
ज़मीन पर घनघनाकर रुके हुए पासे
प्रतीक्षा करने लगता है फिर
किंकर्तव्य विमूढ़ सा ये पांडवी तन
धृतराष्ट्र के से दिए अंध आदेशों का
भावनाओं का फिर फिर
पांचाली सा चीत्कार करना 
कितनी स्वाभाविक प्रक्रिया,,,
जीवन का गांधारी रूप धरना
कितना कुटिल कर्म,,,
इसीलिए शायद ये दिन
दीखता है मुझे दुःशासन
दशाएं और दिशाएं कर रहती हैं
भीतर ही भीतर जिसमे
कुरुक्षेत्र सा घमासान...

प्रियंवदा

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