ओ प्रिय सतरंगी

आज फिर मैंने तुमको देखा
ओ प्रिय सतरंगी
डबडबाई सी इन आँखों में
चिटक छिटक बिखरता
तुम्हारा वही इंद्रधनुषी रूप...।
आज फिर मैंने तुमको देखा
गीले केशों की कोरों पर
नाचती आकाशगंगाओं संग
दिव्यता का पर्व मनाते
ओ प्रिय कंचनकाय...
बदलियों के पार से
गुपचुप ताक झाँक करते
बसन्ती बयारों के कानों
फागुनी झुमके टांकते
आज फिर मैंने तुमको देखा
ओ प्रिय सतरंगी,
तुम! जो दीखते जगत को
एक रंग एकाकार
हो सचमुच के स्वर्णकार
कितने रत्न जड़ देते हो
एक चितवन भर से,
आज फिर मैंने तुमको देखा
ओ प्रिय सतरंगी
छाई नम उदासियों पर
करीने से गर्म लाख भरते
पत्तों पत्तों पर अपनी
नेक की नक्काशियां गढ़ते ।।
प्रियंवदा

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