एक शाम
एक शाम वो अजीज़ सी
दिल के कितने करीब सी
झुकी पलकें गुन रहीं थी
कुछ ज़िन्दगी के साज़ पर
तेरी नज़रें आ टिकी तब
एक अंजाम के आगाज़ पर
गम लिपट आहों उड़े थे
जो सांसों रहे सिमटे हुए
तुम खड़े खामोश से थे
हर आंच जब चुनते हुए
एक नज़र मेरी उठी और
वो कैसा असर तेरा कहूँ
कौन किसकी कह गया
जब खामोशियों की गुफ्तगूं
थरथराते हाथ रख हाथों
थे थामे हर कहर
नीची नज़रों झर उठा जब
पीर घन हो तर ब तर
छा गयी कुछ इंद्रधनुषी
नेह की नम बदलियाँ
बुझी आँखों कौंध उठी
दोनों तरफ ही बिजलियाँ
लाख काँटों में था उलझा
एक फूल जो वो गुलाब सा
खुशबुओं से भर उठा था
खुशनुमा कोई ख्वाब सा
रंग भर बैठी फ़िज़ाएं जब
शाम की हर कोर पर
तुम में मैं मुझमे तुम्ही तुम
पसरे थे हर एक छोर पर
रग रग रवानी भी चढ़ी
पग पग कहानी एक गढ़ी
खो गयी जाने किधर फिर
फुरसत की वो कमसिन घड़ी
कारवां है सांसों का बिंधा
बुझती जगती नब्ज़ पर
आँख आ टिकती है अब भी
उस आहट ए इश्क सुर्ख पर
वक़्त के चले ऐसे खंजर
ख्वाब सब आरी हुए
आ भी जा बड़े दिन हुए
वो शाम ए दीदारी हुए.....
प्रियंवदा अवस्थी
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