अब प्राकट्य तुम्हारा हो

आँख मूँद बैठे हम कबसे
अब तो प्राकट्य तुम्हारा हो
पिघले माटी, उठे व्योम गन्ध
ऐसा सानिध्य हमारा हो।।
मन मोह नही कोई हमको
फूलों का हार मिले न मिले
फ़िक्र नही तन राख बने
नदिया की धार मिले न मिले
आ जाओ प्रिय सुनके पुकार
ये स्वांस समीर बना दो तुम
ढले कालरात्रि मिले तेरा साथ
औ विकल हृदय पर हाथ मिले
रंग लाओ चूनर प्रीति लाल
मुखन पर झीना घूंघट डालो
ले चलो पार वैतरिणी के
तेरे गाँव नया संसार मिले
कुछ प्रश्न उगेंगे जग में फिर
हर उत्तर समय बताएगा
आया इस देश यहां जो भी
उस पार कभी तो जायेगा
अनकहे समझ लो मन की तुम
ऐसा अधिपत्य तुम्हारा हो ।।

प्रियंवदा

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