प्रेम सिंचित साधना में

खिल उठे हो आज अधरों झिलमिल फुहारों मध्य तुम
प्रेम सिंचित साधना में ,प्लावित नयन और साध्य तुम

गात इस आघात अगणित है दे रही प्रतिकूल धारा 
चीर कर भ्रम का भँवर इस मन ने है तुमको पुकारा

घन तम घटे पूनम खिले काटो कठिन खग्रास तुम
प्रेम सिंचित साधना में प्लावित नयन और साध्य तुम

अर्चना में भावना में, सर्जन का कल्पित द्रुम तुम्ही
प्रतिपल द्रवित जीवेषणा में जागृत मेरा वर्चस्व तुम

प्रीत के पुंकेसरों को चुग चुन रहा दिनकर भले ही 
बीज नव भू घोलने को होंगे कभी तो बाध्य तुम

देह खोखल रज्जु घायल व्यर्थ है जग चक्षु दर्पण
उज्ज्वल मिले है बिम्ब धारा साधना तो आत्मतर्पण

क्लेश के कोटिश हलाहल पीकर न होंगे व्यग्र हम
प्रेम सिंचित साधना में, प्लावित नयन और साध्य तुम

प्रियंवदा

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