भीड़ में तन्हा रहने के सीखे यहीं सलीके हैं

भीड़ में तन्हा रहने के सीखे यहीं सलीके हैं

इस दुनिया में जीने के सबके अलग तरीके हैं
सो भीड़ में तन्हा रहने के सीखे यहीं सलीके हैं ।।

अपनी न कहो तुम कुछ सब दूजे की जान लो
बड़ी ही खूबसूरती से किसी का भी ईमान लो ,
दूकान रख लो ऊँची पर सामान रखने फीके हैं ।।

रोते के कंधे हाथ रख कुछ ग़म जता भी लो
मुख मोड़ते एक बोझ सम दामन को झाड़ लो
हम जैसे कितने यहां दरवाजों पड़े गलीचे हैं ।।

ईमान की कसम पे शुरू हर बात मन में गुन लो
इस रास्ते गिरी हुई कुछ बेइमानियाँ भी चुन लो
खट्टे होने हैं मन मिजाज़ मगर परोसने मीठे हैं।।

होंठो सजे मुस्कान फिर दिल क्यों न छील जाये
आदम में बसा इंसा ही इस दुनिया को नज़र आये
धुन प्रीत हो एक छलावा और बोल रखने तीखे हैं ।।

हैं बाते ये बड़े पते की जो तुम अब भी मान लो
रेशम का एक नकाब तुम जरा चेहरे पे तान लो
कच्चे रहे थे शायद कहीं इस ही लिए तो रीते हैं ।।

इस भीड़ भरे जग ,कभी तुम तनहा न जियोगे
हम जैसे मन ही मन न ये घुट घुट के कहोगे
दो मुंह रखे हैें जो यहां बस वही जीभर के जीते हैं।।
प्रियंवदा

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां