प्रिय तुम होते जो पास

प्रिय तुम होते जो पास मन ये मगन मोर बन जाता
दिशा चतुर्दिक पियु पियु का शोर गगन तक जाता
सुन रथ पर चढ़ आ जाते बादल छा जाते हर छोर
तृषा धरा की मिट जाती खिल उठते तन मन पोर

कर सिंगार ठुमक संग चलती डाल हाथ में हाथ
दिन ढलते की खबर न होती कब ढल जाती रात
सखी पिया संग चिहुके बिहसे भूल जेठ का ताप
देख पीर द्विगुणित दहके मन दुसह बिरह आघात

थाम हाथ जो छोड़ गये मन प्यास त्रास बनी बैरन
लगे अप्रिय बाग बौराते मुंह बिचकाए आंगन
प्रिय तुम होते जो पाश खूब उमसते दो बिरही मन
घोर तिमिर नभ छा जाता, तकते नयनो के दर्पण

प्रियंवदा अवस्थी

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