तुम मगर होते नही
बोध होता है तुम्हारा , तुम मगर होते नही
बन्द आँखों में बसे क्यों तुम कभी सोते नही
छल बल तुम्हारे कर्म में निस दिन हमें हैं दीखते
बांटते हर बात लेकिन भव बोझ ढोते क्यों नही ।।
संग होकर हो असंगी दृश्य तुम होते नही
एक होकर भी हमारे स्वप्न एक से क्यों नही
चेतना तुम प्रेरणा तुम प्रीत तुमसे जन्म की
आस बोकर मिलन का क्यों अंकुरण करते नही ।।
छोड़कर इस देह को नभ चूम आते नित्य ही
मथ रहे अंतर निरन्तर क्यों हूँ भला मैं रिक्त सी
छेड़ते नव राग नित श्रृंगार भरते हो देह पर
क्यों भला सम्मुख प्रकट इनसे उलझते हो नही ।।
मन्तव्य किंचित ज्ञात कुछ और कुछ अज्ञात भी
प्राण के आयाम हो तुम कर्म हो पुरुषार्थ भी
योग तुम संयोग तुम सन्देश देते विलय का
डोर स्वांसों के बंधे परिणति बताते क्यों नही ।।
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