हिंदी
आँख खुली देखा ललाट
माँ सजा हुआ था बिंदी से
अभिनन्दन करते स्वर निकले
अपनी भाषा हिंदी से ।।
उम्र बढ़ी सुनते वह लोरी
जिन शब्दों ममता घोली थी
फूटे थे जब प्रथम बार
इस मुख ने हिंदी बोली थी ।।
जन्मभूमि ज्यों होती प्यारी
निज भाषा गौरव होती है
बोलो क्या अपनी माता से
और कोई प्रिय होती है ।।
जन्मभूमि से करते निष्ठा
लिपियों का सम्मान रहे
हिन्द देश के हैं हम वासी
हिंदी अपना अभिमान रहे ।।
शब्द पराये लेकर क्यो हम
वाग धर्म को नष्ट करें
घालमेल करते शब्दों से
निज भाषा को क्यों भ्रष्ट करें
निज मिट्टी में उगी फसल
ही, अपनी सम्पति होती है
कहो उधारी के अन धन
कभी पेट भराई होती है ।।
ज्ञानार्जन होता अति सुन्दर
पर मूल जड़ों में नमी रहे
जिस संस्कृति ने ज्ञान दिया
क्यों पोषण में कोई कमी रहे ।।
देश विदेश कहीं हम जाएं
निजता अपनी पहचान रहे
हिन्द देश के हम हैं वासी
हिंदी अपना अभिमान रहे।।
गीत कवित्त सवैया दोहा
कुण्डलिया और चौपाई
बोलो न किस देश की भाषा
इतनी विविधा लिख पाई ।।
सरस सरल शोभित सुकंठ
रस छंदों की यह भाषा है
वर्ण वर्ण पर शिव की महिमा
पाणिनि की अभिलाषा है ।।
देव वाणि से निकली धारा
परिष्कार हुआ हिंदी में
प्रण लें सह अभिमान चलो
हर काज करेंगे हिंदी में ।।
देश धर्म नीति जब कहती
स्वत्व सदा पहचान रहे ।
फिर हिन्द देश के हम वासी
हमें हिंदी पर अभिमान रहे ।।
प्रियंवदा
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