वो बेवफा वक्त के माफिक
आज की हर बात को वो कल पे टालता रहा
वो बेवफ़ा वक़्त माफिक वक्त निकालता रहा
खुशी नाराज़ी मुहब्बत बात सारी दिल में रख
ज़िन्द की ख़ातिर फ़क़त ज़िन्द निकालता रहा
चाहतों की बात मेरी ज़रुरत उसके ठिकाने
इक मुकम्मल होते ही वह दूजी रख जाता रहा
ख्वाब नज़रों में जगे कुछ साँझ की सरगोशियों
रात की करवट पे जालिम भोर लिख जाता रहा
वक्त की चौपड़ युगों से चौतरफ बिछती रही
फर्क़ उसने कब किया कौन आता जाता रहा ।।
प्रियंवदा अवस्थी
Comments
Post a Comment