देह धर्म के हर उपक्रम से

देह धर्म के हर उपक्रम से
धीरे धीरे ऊपर उठकर
बुझ जाऊँगी जब मैं प्रियतम
तुम तब सहज प्रकट हो जाना

अथक यत्न भी दृष्ट नही जो
चर्म चक्षु ये धृष्ट नही जो
किसी भोर के उग जाने पर
इन नयनों के मुँद जाने पर
आकृति करते निराकार तुम
उस दिव्य दृश्य साक्षी हो जाना

रन्ध्र रन्ध्र बंधक पंछी सा
इक वह जो मुझमे औ तुम में
इस में भी और हाँ वह उस में
मृदा यंत्र के स्वसन तंत्र की
हर चौखट के जर्जर पट पर
कम्पित दो हाथ पकड़ने आना

प्रियंवदा

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