कहो रीत प्रीत ऐसी कभी तुमने ...


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सज कर पियु संग डोली आई 
कितने अरमान संग लायी 
इक छोर लहू विवश मन
बँधी डोर से खिंचती आई
यह प्रीत की रीति बनी जग
प्रिय तुमने भी कभी निभाई ...

इक माटी से दूजी में मिल
कुम्हलाई ,फिर जड़ें जमाई 
खिली कहीं और महक कही
नव बगिया सी कहीं बनाई
माँ की प्यारी, लाड़ो बाबुल
कोमल देह हवा कुम्हलाई
झुनक ठुमक कर, चल नव आँगन
सतहों धूल गर्द फटकाई

हर एक खटक जगते सोते
हलचल दहशत, अन्तस् जीते
नए देश मे, नया भेस रच
जित ममता समता परछाईं
प्रीत रीत कब, ऐसी कोई ?
प्रिय तुमने भी कभी निभाई ?....

कच्चे धागे की आड़ लिपट
बुनती अखण्ड तानेबाने
सब खींचे अपनी ओर उसे
उसको ही थे सब सुलझाने
दो हाथों उसने एक समय
सौ मांगों से,वफ़ा निभाई.....

जन्म जन्म के बंधन पर
विश्वास हृदय जीती है वो
समदृष्टि कभी देखो उसको
सहज घूँट भर, पिए पीर जो
खिले चेहरे  देख सभी के
जिसकी रोम रोम मुस्काई।

शमन दमन चाहत कर जीकर
सहज विषमता विष भी पीकर
रात रात भर जागी फिर भी
ममता जीवन भर बरसाई
हाथ चुटीले फिर भी जिसने
रोटी वत्सल भाव पकाई 

घर मिला बड़ा या फिर छोटा
माना उसको सुख का गाँव
चादर छोटी पतली झीनी
सिमटाये भीतर अपने पाँव
कटु फल चख परसे मीठे से
ज्यों शबरी सी भक्ति जताई

जप तप कर संसार बनाते
वर्षो तक परिवार चलाते
दायित्व समझ,उस भूखी ने
सरका दी थाली निज जिसने
अधिकार कभी यदि चाहा तब
जग ने खाली झोली दिखाई

शान बनी दो कुल की वह जो
बनकर रही बरसों वर्ष पराई
प्रीत रीत कभी ऐसी कोई
प्रियतम तुमने कहाँ निभाई?
प्रियंवदा अवस्थी

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