छत पर मेरे ठहर एक क्षण

छतजब सूरत सी सूरत नही है  तब तो हर वक्त आईना निहारती रहती है जो ऊपरवाला थोड़ी खूबसूरती दे देता तो न जाने क्या करती महारानी।

दादी अम्मा की धारदार बातें सुनते ही तन मन मे बहती जवानी की रौ की अबूझ पहेली सुलझाती हुई चंदा का दिल जैसे छन्न सा होकर टूटकर रह गया ।आंखों में छलछलाहट और सामने के आईने में मानो सैकड़ों दरारें पड़ गयी हों और हर एक टुकड़े के उस पार से झांकता हुआ उसका शांत चेहरा सहसा ही ज्यों वीभत्स आकार लेकर उसे ही डराने दहलाने लगा। उसने झट से अपनी आंखें मींच लीं और हम आंखों धड़कते हुए दिल से वह दर्पण से दूर हट गई ।

सांवली सलोनी सी चंदा , हाँ वो चंदा किन्तु अपनी मृत माँ के दिये नाम से बिल्कुल विपरीत । चन्द्रमा जैसी तो बिल्कुल नही थी वह । शक्ल ओ सूरत में बिल्कुल सामान्य सी दीखती थी, माँ बचपन मे जन्म देते ही गुज़र गयी और बापू जवानी की दहलीज पे कदम रखते ही चल बसे अब ले देकर उसकी बूढ़ी गरीब दादी ही रह गयी थी उसे सम्हालने के लिए।

क्रमश: 

छत पर मेरे ठहर एक क्षण बादल बरस गया
भिगो तप्त तन प्रीत फुहारों देकर मरज गया
अता पता मालूम नही जो लिख भेजूं सन्देस
गरज़ चमक इठलाता वह अब जाने किधर गया ।।

प्यास त्रास की व्यथा कथा क्या जाने बदरा
चिटका मन, भीगे नयना मुरझाया कजरा
तब आये प्रिय भर भर के हृद गागर में सागर
बिरह गात स्पर्श अम्बु का क्या कुछ दहक गया ।।
प्रियंवदा अवस्थी


निकलता है सूरज ढलकता है दिन

यूँ ही तो बने हैं यहाँ रात दिन।

उदय है कहीं तो कहीं अस्त भी है,

मेरे दोस्त कहते इसे ज़िन्दगी हैं ।।


मिला जो भी चाहा खुशी छा गई

बड़ा दुःख हुआ जब कमी आ गयी।।

कमोबेश ऐसा  चलन है धरा का

नही एक रंग ढंग रंगी ज़िन्दगी है ।।


प्रियंवदा अवस्थी



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