शरद पूनम विशेष


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गुजर गए अनगिन पखवारे
पर तुम ना आये
ऋतु दिन खिल खिल मुरझाए
पर तुम ना आये ।।
वो शहद भीगी यादें तेरी
मन में मिठास भर जाती हैं
चूम शरद की सरहद प्रिय
मिलन बहुत अकुलाती हैं।।
चुन चुन तारक सजा दिए
एक एक कर चौबारों में
मिले जहाँ हम तुम हर एक
उन सपनीले गलियारों में ।।
ज्यों ज्यों पाँव रखो अपने
आवक को मधुबन मन में
उतने उज्ज्वल दिखो आज
सघन गहन अंधियारों में ।।
खोल व्योम की एक खिड़की
उलझे से केश सवारूँ मैं
ओढ़ चुनर फिर से झिलमिल
टुकटुक राह निहारूँ मैं ।।
जित जित तुम रुख करो
कण कण रज रज  हो जाए
छुनक उठे कटि पर झूमर
औ चमक चाँदनी बलखाये ।।
रुच रुच बीने उदक हथेली
यहाँ माह बरस दिन रात
आँच प्रतीक्षा सौंधी करके
निज आँगन हूँ बैठी आज ।।
धवल कटोरे प्रीति परोसी
चख जाओ मेरे लजीले हाथ
प्रीत अमर हो जाये अपनी
अमृत कुछ यूँ बरसे आज ।।
प्रियंवदा अवस्थी

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