एक पाती लिखनी है तुमको
एक पाती लिखनी तुमको क्या आज लिखूँ
विरह कहूँ प्रिय या मिलने के हर राज लिखूँ ।।
आन मिले जब निपट अँधेरी रात प्रिये
सिहर उठा मन स्वेद स्वेद था गात प्रिये
हाथ पकड़ते मुखर हुए चौमुख सन्नाटे
नयन दर्प तक नयन सिमटती लाज लिखूँ ।।
आलिंगित से दृष्टिपात मन गह्वर मंथन
भ्रमित चित्त भूला पथ हृद गति के स्पंदन
शब्द तालु अटके नस नाड़ी रतिमय नर्तन
जम्भित रंध्र रंध्र अनुपम ऋतुराज लिखूँ ।।
स्वांस स्वांस फगुवा फूटी अमराई की बौर
पात पात मंडराया मधुकर जैसे कोई चोर
मदन गंध छुप बैठी अन्तस् हिय पंकज ठौर
आखर आखर प्रणय प्रीति पराग लिखूँ ।।
प्रियंवदा अवस्थी
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