सोंधे स्वप्न
सुनो
तुम्हारे गठीलेे बदन के
एक एक रोमछिद्रों से
टपके हुए स्वेद ने
जिस दिन से
आलिंगित किया है
इस तपती हुई देह की
मौन आख्याओ को
तकियों की कोरों पर
सोंधे से कुछ स्वप्न
रतजगे लेकर
बैठ गए हैं चुपके से आकर
कानों फुसफुसाते हुए
रतिमय बहलावे रखते रहते हैं
करवटों उलझी व्यथाओं पर
उलझे बालों की एक एक
लटों को हटाते सहलाते
रह रह कर कानों लग
सुनाते रहते हैं
युगों की धरा पर उगी
सुनी अनसुनी अनेको
गौरव गाथाऐं
मिलन बिछोह के
ताने बानो में गुंथी
उन कहानियों को सुनते
सुलझते जाते हैं सारे दर्द
सम्बल बनते जाते हैं
ढलते हुए प्रहर
एकाकीपन की डगर
रात की सन्नाटी मुंडेरों पर
अंगड़ाते हुए विस्तृत आकार
लेने लगती है तब मेरी तुम्हारी
अकथ्य प्रणय गाथा.........
दिन के उजालों के
तयशुदा थपेड़ों से जूझ
पोर पोर की थकन से
किसी शरीर के शिथिल हो
शैय्या पर निढाल होते ही
चेतना का नींद के गाँव
का आतिथ्य स्वीकार कर लेना
दैहिक जीवन चर्या का
एक तयशुदा नियम
किन्तु...
अंधेरों की आड़ में
इन जागते स्वप्नोंं की सौंध को
नथुनों से सूंघते ही
सम्मोहक मुस्कान बिखेरते
नटखट हो उठती हैं
संदली स्मृतियाँ
सिहरन देने लगती है इनकी
चुलबुली उँगलियाँ
मन की सरफुन्दियों को
एक एक कर खोलते
निहारने लगती हैं नज़रें
पलकों पर सिमटी छुईमुई को
ओढ़ लेती हूँ झट मैं
सर से पांव तक
फिर से वही गुलाबी चादर
सिमट जाती हूँ
पूरी की पूरी मैं
तुम को साथ लेकर
क्षार क्षार होने लगते हैं
सारे अहम और वहम
ठहर जाती हैं आकर
रात के शबनमी होठों पर
कितनी ही बातें
सिर्फ तुम सुनाई देते हो फिर
चढ़ती गिरती स्वासों के संग
मुझमे.......
गहरे और गहरे उतरते हुए .....
प्रियंवदा
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