लिखो तुम अमावस
लिखो तुम अमावस गगन आज प्रियतम
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लिखो तुम अमावस गगन आज प्रियतम
मुझे चाह है चाँदनी ओढ़ने की
छुपाकर तुम्हें अपने केशों के पीछे
ख्वाहिश है कानों में वो बोलने की
उजालों न जो बोल पाई निगाहें
खामोश से ऐसे दो बोल कह लूँ
घड़ी दो घड़ी को सही साथ रहकर
वो सारी कही अनकही बात कह लूँ
मुझे है पता फिर वहीँ तुम मिलोगे
बहुत शोर होने लगा है वहाँ
बस एक रात ठहरो सजा लूँ तुम्हें
मैं इस एक कोने घन अँधेरा जहाँ
तुम्हे भी खबर और मुझे भी पता
हुई चाँद की कब अचल ये धरा
कुछ दिन उजाले कुछ दिन अँधेरे
कदम दर कदम साथ तेरे औ मेरे
नींद और सपन सा ये साथ अपना
मिला हमको जबतब अंधेरों घनेरे
कितनी महक सी उठी रातरानी
तुम इनको जो चुन लो मैं गजरे पिरो लूँ
लिखो तुम अमावस गगन आज प्रियतम
मुझे चाह तेरे सुख सपन ओढ़ने की
उजालों न कह पाई नज़्र ए हया जो
ख्वाहिश वो दिल की गिरह खोलने की,,,
प्रियंवदा अवस्थी
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