यादों की फुहारें

#भीगासावन

यादों की फुहारों का मिल जाना क्या सफ़र में
आभास उस छुवन का सिहरन ठगी बदन में
साँसों के थपेड़ों में उलझी वो ही महक थी
सावन मिला नहाते मन बीच एक तरण में ।।

हाथों की उँगलियों में पीतल का छुपा छल्ला
करने लगा सगन घन धरती से हो निठल्ला
पलकों की पाट मन को बैठा के साथ बैठा
पींगें बढ़ा के संग संग रहा डोलता  गगन में।।

संझा की सुर्खियाँ भर सिंदूर नभ सिंधोरे .....
बादल की ओट शशि ने निशि मांग फिर सजाई
भीगी चुनर को सर रख झुकते हुए नयन पर
रचने लगे प्रणय प्रिय, प्रिया भाव आचमन में।।
प्रियंवदा अवस्थी

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