बादलों की चादरों पर
बादलों की चादरों पर फूल रेशम के खिले
और तुम हर इक कली नव रंग भरते से मिले ।।
क्रूरता वसुधा बसे उगें सैकड़ों कंटक जहाँ ।
शूल पगतल से हटाकर घाव तुम सिलते मिले।।
चाँद की डग पर सितारे रोशनी रख हाथ मे
स्याह घर की खिड़कियों से झाँकते तकते मिले।।
धरा की धारें नुकीली जो चोट करती चोट पर
औ गगन पर रिश्ते नाते संग साथ देते से मिले।।
प्रीति की कटुतम परीक्षा स्वप्न में चलती बरस
मिलन रचते चक्षु झिलमिल ओटकर झरते मिले ।।
प्रियंवदा अवस्थी
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