कल्पनाओं की कलोल कन्दराओं में

सुनो प्रिय
मेरे हर लिखे में
अलिखे को
समझ कर
विचरने लगोगे
जिस किसी भी दिन तुम
कल्पनाओ की कलोल
कन्दराओं के मध्य
तराशी हुई जीवनाकृतियों को
अपनी उंगलियों के पोरों से
हौले से सहलाते
उस एक दिन
शब्दों के कोई मोल न बचेंगे
सच कहती हूँ
तुम उधर बह निकलोगे
और मैं इधर कलकल करती
निकल पड़ूँगी
सूरज के सुर्ख गाँव से होकर
रेतीली रजस धरती पर
ओस से नम बिछौने बिछाते
नर्म ख्यालों की घास के
पके हुए कुछ बीज
अपनी चोंच में उलझाकर
जाने कब ही गिरा आई थी
उन आड़ी टेढ़ी पगडंडियों पर
चेतना की चपल चिरैया
मिलन की मूर्धन्य मंज़िलो को खोजते
मिला था जहाँ उससे
जीवन का एक चतुर चिरौटा.....
प्रियंवदा अवस्थी

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