हिंदी किधर गयी

हिंदी किधर गई......

लोग जो तनिक आधुनिक हैं हो रहे
दिन चढ़े तक मुँह औंध कर सो रहे
पूरब जाने कब सूरज राइज हो गया
बदले रँग ढँग देख सरप्राइज हो गया
पिता जी मॉडर्न होकर डैड बन गए
देववाणी सुन आज बच्चे सैड हो गए
माँ मिस्र जाके ममी में  कैद हो गई
एडवांसनेस की कतरनें ओढ़कर
हाय रे हिंदी तू कितनी बैड हो गई ।।

अगड़म बगड़म कुछ भी तो बोलता है
सॉरी थैंक यू अपनी जेब रख हर कोई
खुद को विनम्र और संस्कारी तोलता है
संस्कार संस्कृति को विकट जंग हो गई
मातृ भाषा ज्यों ज्यों मदर टंग हो गई

संस्कृति लचीली तो विस्तार सिखलाये
कैसे कोई निजत्व की पहचान बिसराए
समय ने स्वत्व को यूँ धता है बतलाया
श्रुतियां छोड़ शिशु को पोएम सिखलाया
हिंदी की पीठ पे जब से अंग्रेजी चढ़ गई
माँ के शुभ ललाट से ज्यो बिंदी उतर गई
ढूंढो कोई न जाने मेरी हिंदी किधर गई।।
प्रियंवदा अवस्थी

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