तुम आओ तब दीप जलाऊँ
तुम आओ तब दीप जलाऊँ
जीवन के हर तिमिर भगाऊँ
रुच रुच माटी छानी काढ़ी
इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी
ओ कुम्हार मन की सुन पाओ
भ्रमित हुआ ये चाक चलाओ
दो हाथों से ना बने दियाली
तुम बिन कैसे मने दिवाली
आस के मोती फूल बनाऊँ
मन आंगन घर द्वार सजाऊँ
तुम आओ तब दीप जलाऊं....
दिन दिन अट्ट जव धान तपाये
चुन चुन जीवन भार भुंजाये
अंसुवन मिसरी डली बनाई
भर भर मुठियन थाल लगाई
अनुक दीप चुप बैठी बाती
कालनिशा बन जाए न राती
तुम आओ तो अगन जगाऊँ
तुम आओ तब दीप जलाऊँ...
सावन भीगा भादों सीझा
अब चहुँ दिशि पतझर है रीझा
खेत पड़े खलिहान खड़े हैं
तुम बिन सब बेकार पड़े हैं
नई फसल की आयी बारी
कर बैठी हूँ सबरी तैयारी
कब तक सूखे धान पसाउँ
तुम आओ नव फसल लगाऊं....
प्रियंवदा अवस्थी
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