सन्नाटे भी बोलते हैं
सुना है कभी ?
सन्नाटे भी बोलते हैं ....
कल बरसों से मौन एक सन्नाटा
मन की दीवारें तोड़
बेतहाशा चीखने लगा....
तो दूसरा व्याकुल हो
तड़पने लगा,
शरीर के भीतर ही कहीं ....
कुछ सुर में, कुछ बेसुरे
कहने को ये सन्नाटे
पर बहुत बोले कल वीराने में ...
गूंज रहे हैं अब भी कानों में
जिनके परस्पर वाद- प्रतिवाद
अनपेक्षित बोल ....
कौन किससे बड़ा था
नही मालूम ...
एक जरा सी आहट-
दहलीज के उस पार से
मौन होकर समा गए
फिर से वे मुझमे ही कहीं....
सन्नाटे,,,,
जो सन्नाटों में ही शोर करते हैं
अक्सर,,,,
तन्हाइयों के इर्द गिर्द,
मन की दीवारें तोड़
तन की सीमाएं लाँघ .....
प्रियंवदा
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