सर्पदंश सा एक प्रश्न

सुनो प्रिय,,,,
तुम तक पहुंचे
मेरे कितने ही मूक सन्देशों
तथा मुझमें सम्प्रेषित तुम्हारे
उन सैकड़ों उत्तरों में
शायद यह सबसे अहम ....
दैहिक सत्य के धरातल पर
कुछ एक प्रश्नों का भीतर
शेषनाग सा फन काढ़ लेना
उतना ही स्वाभाविक,,,,
जितना इस संसार के लिए
तुम्हारा मेरा यह
अदैहिक अलौकिक सम्बन्ध ,,,
और इसकी बृहद व्याख्या,,,
न जाने क्यों,
बहुत छलते हैं ऐसे प्रश्न
ऐड़ी से चोटी तक विषाक्त
कर जाते हैं देह का अस्तित्व ...
यूँ तो तुम भी एक पुरुष ?
हर देह की रचना में
तुम्हारा अंश समाहित
किन्तु तुम उस पर ढेर कदापि नही,,,,,,
क्यों स्त्री की देह पर
कुछ देर को ठहर
ध्वस्त हो जाता है
ये धरातलीय प्रेम और पुरुषत्व ?
क्योँ फिर कोई दायित्व
शेष नही रह जाता
उसके लिए ...
पुरुष जो दृढ़ है, श्रेष्ठ भी
जो आधार है और आलम्ब भी,,,
स्त्री की कोमलता को
अपना दृढतम स्पर्श दे
किरण के रथ पर आरूढ़ करा
उसे उसके हिस्से के आसमान पर
इंद्रधनुष रच लेने देने को ,,,,
जो सक्षम भी,,,,सबल भी
फिर क्यों बिखेर देता है वह
उसकी कोमल कल्पनाएं
अनन्त की ओर उन्मुख हुई
उसकी हथेली से
क्यों सोख लेता है वह
वे सारे के सारे रंग....
क्यों अगढ़ रह जाती है आधे रास्ते पर
एक सम्पूर्ण पुरुष की छवि,,,
जिसमे शायद कहीं वह उसे गढ़ती
और करीने से मनभावन रंग भरती,,,
क्यों भरभरा सा जाता है फिर
ये धरातलीय पुरुषत्व
उसकी देहयष्टि को चक्षु मात्र से
तनिक स्पर्श करते ही,,,,?
और फिर कौंधते रह जाते हैं
रग रग में रह रह कर
सर्पदंश करते ऐसे प्रश्न,,,,,?
प्रियंवदा अवस्थी

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