मंथन
दिन उतरे जो कुछ भी
शेष है अब अपने पास
बरसों बरस का संजोया
चलो उसे कुछ आंच देते हैं...
कुछ दिन के लिए सही
इसे यूँ ही हम ढाँप देते हैं ...
फिर किसी एक रोज़
जागेंगे दोनों मुंह अँधेरे ...
मथेंगे साथ मिलकर
अनुभव तेरे और मेरे...
गाते गुनगुनाते,
सवालों उलझते, जवाबों मुस्कराते..
जो कुछ भी सार उसमे
अंततः उथला आएंगे
अपने अपने चाँद की ज़मीन पर
दोनों ही चुपड़ेंगे ,
फिर साथ साथ खाएंगे...
देखा है मैंने ज़िन्दगी तुम्हें
कितनी ही बार
कर्तव्यों के ठोस धरातल बैठ
सूखे निवाले घोंटते
कितनीं ही बार ,,
नज़रों उथला आयी नमी से
फिर फिर उन्हें नम करते....
प्रियंवदा 2014
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