शर्तों के धरातल पर प्रेम लिखना कठिन

सुनो प्रिय
मेरे प्रेम गीतों को सुनते
कितनी ही बार तुमको
बेमौसम मधुमास बनते देखा मैंने,,,,
गज़लों की झील में भीगा
सहमा ठिठुरा सा चाँद,
कितनी ही बार ठहर सा गया
फिर रात के कन्धों पर आकर...
दोनों ने साथ मिल
खुली अधखुली आँखों में
कितने मखमली स्वप्न बोये....
अह! मेरी लेखनी पर
तुम्हारी ये एक दृष्टि-
फिर कितने ही सावनी ख़त
मन की लिखते न थके ...
फुहारों भीगते सूखते
कसमसाते फड़फड़ाते रहे...
पुरवा पछियांव से चिरौरी करते
तुम तक यथावत पहुंच सकने के लिए,,,
सब कुछ ज्ञात भी है तुम्हे -
और मुझे भी तो ,,,,,
तुम्हें संयोग लिखना बेहद पसन्द,,,,
किन्तु निरन्तर अनन्तर तुमसे
मन की सब कुछ
कह लेने की चाहत में
अनचाहे जन्म ले लेता है विरह...
कदाचित्...
प्रीत पर जगत की पैनी ,कुदृष्टि ..
उजालों में संयोग के सुयोग्य श्रृंगार
भरने पर तुम्हारी मौन रोक टोक...
अह ,,क्या समझो तुम...
शर्तों के धरातल पर प्रेम को लिखना
कितना दुष्कर, कितना पीड़ादायी...
आँखों के मूँदने और खुलने के मध्य
जो तय कर दी तुमने ..
अपने मिलन की सीमा रेखा ....
14/10/2016
प्रियंवदा अवस्थी

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