चितवन चितवन
चितवन चितवन सुर्ख शाम थी
धड़कन धड़कन शोर तेरा था
पलकों चुनती रात ख्वाहिशें
झुके नयन ,,,अहसास तेरा था ।।
लहर लहर पर प्रीत लिखी थी
गहर गहर कुछ था मन भीतर
अँजुरी भर मुस्कान अधर पर
कुछ यूँ हृद पर हाथ धरा था ।।
हर पीड़ा क्षण में बह निकली
मौन वचन क्या कुछ तुम बोले
लहर लहर पसराई सौगातें
गुपचुप मन सब तौल रहा था ।।
ढलक उठा सूरज निशि उतरी
प्रणय वेदि कर प्रीत आचमन
राग रंग सुधबुध सब धूमिल
आदि अंत का बोध किधर था ।।
प्रियंवदा अवस्थी
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