मत छल
मत छल अब ओ कारे बदरा
झमक झमक कर तू झर जा
चमक गरज संग ले फुहार
घर आँगन तन मन तर जा।।
झुलस रही चौतरफा माटी
ठनक गये कुटिया में कुठले
चढ़ा ताप भुइँ छोड़ गगन पे
असह्य विपत नकुवन चढ़ बोले
कूप ताल घिरी घोर निराशा
चातक एक बूंद को प्यासा
आस सुखानी अंखियन सावन
विनय करें खग गूंगी भासा
छपरा दिन दिन
मत छल मोरे घर बन रही
अब हथरोटिया गिन गिन
पिघला जावो माटी बरसो
घनक धनक घनघोर
भर जावो खेत तालाब
चलूँ बांध गाँठ कुछ नाज खेत की ओर।।
प्रियंवदा
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