सूनी आँखें मुड़ मुड़ के देखूँ
सुनो प्रिय ,,,
बहुत तपी हूँ तुम बिन
मास दिवस ऋतुएं गिनते
हवाओं भेजे सन्देश पढ़ते
जलते भुंजते..
जो भेजते रहे जब तब
अधरों के सूख जाने पर
तन बेजान होने की पाकर ख़बर
प्रतीक्षा की अनगिन बूँदें पिरोई
इन भीगी सीझी आँखों
निश्चित ही झरी होंगी
वे सब तुम्हारे कांधों
किन्तु तुम क्यों कर कुछ बोलोगे
सब कुछ बस नैनों से ही तोलोगे
किन्तु इस बार की पुरवाई
मुझ तक जो सँदेसा है लायी
उन पातियों की सीली कोरें
दिखती नहीं पराई..
जाओ नहीं करना तुमसे
कोई भी सवाल
मुझसे बेहतर कौन जानेगा
तुम्हारी रग रग के हाल
तुम भी कम नही बदहाल
देस परदेस भटकते फिर रहे
काटते भव जाल
चले आओ हर बन्ध तोड़
वर्ष भर की सारी जमा पूँजी जोड़
तुम बिन कैसे होगी बोलो ना
इन हाथों की मेहंदी लाल
सूनी आँखों मुड़ मुड़ के देखूं
मन सावन के झूले घाल....
प्रियंवदा
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